गुरुवार, 7 जुलाई 2011

कब तक निर्दोष होते रहेंगे: पुलिस व नक्सलियों के गोली के शिकार


कब तक निर्दोष होते रहेंगे: पुलिस व नक्सलियों के गोली के शिकार

चांदों मामले में अपने को पाक साफ साबित करने पुलिस ने बनाई कहानी, नक्सलियों के आड़ में मारी गई निर्दोष युवती, जनता के आक्रोश को दबाने छावनी में तब्दील हुआ गांव


(अम्बिकापुर/पुलिस ने 6 जुलाई के तड़के सवेरे मिना नाम की एक 16-17 वर्षिय युवती को अपने गोली का शिकार बनाया लेकिन पुलिस का कहना था कि उसने नक्सली मुठभेड़ में उसे मार गिराया है, जबकी वास्तविकता के धरातल पर ना तो क्षेत्र में कोई मुठभेड़ हुई और ना ही नक्सलियों से पुलिस की मुलाकात लेकिन इसके बावजूद सरगुजा पुलिस रेंज के बलरामपुर पुलिस जिले के चांदो क्षेत्र में 16-17 वर्षीय युवती मीना की पुलिस द्वारा हत्या ने सभी को चौंका दिया है, अब हर कोई यही पुछ रहा है कि आखिर मीना जो कि घर में रहकर परिवार के साथ कामकाज किया करती थी, एक रात में ही नक्सली कैसे बन गई। मीना के मौत ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं, लेकिन पुलिस ने जनता के आक्रोश को दबाने क्षेत्र को छावनी में तब्दील कर दिया है, लगभग 400 की संख्या में सीआरपीएफ और पुलिस के जवानों ने क्षेत्र में सुरक्षा व गश्त के नाम पर घेर रखा है, ऐसे में इस दुर्घटना ने एक बार फिर सरगुजा जिले में पुलिसिया कार्रवाई पर अंगुली खड़े कर दिये हैं, लेकिन एक बार फिर से सत्ता व विपक्ष दोनों ही शांत है जबकि जनता का गुस्सा सांतवे आसमान पर है। - अंचल ओझा)

जब नक्सलवाद और इस पर चलता सरकार व पुलिसिया डण्डा के बारे में जब एक पत्रकार के नाते विचार करता हूं तो काफी कुछ लिखने को विचार होता है, अंदर से ऐसा लगता है कोई पिट रहा हो और कह रहा हो मुझे बचाओ मैंने क्या किया जो मुझे इसकी सजा मिल रही है, ये भाव मेरे जरूर हैं लेकिन ये पुकार उस आम आदमी की है जो कि सरकार, पुलिस व नक्सलवाद के बिच फंस कर रह गया है, वास्तव में इसे ही बलि का बकरा बनाया जा रहा है। छ.ग. में रहता हूं और इसलिय यहां पर काफी नजदिक से मैंने नक्सलवादी हिंसा व नक्सलवाद को देखा है, जिसके बिच मैंने पुलिसिया कानून व इस बिच सरकार के दावों व घोषणाओं तथा आम आदमी के साथ उसके बर्ताव को भी देखा है। यह कहना गलत ना होगा कि नक्सली हिंसा से ज्यादा आम आदमी पुलिस व सरकारी लाव-लश्कर से परेशान है।
कल सुबह लगभग 7.30 बजे जब मैं ग्राउण्ड में घुम रहा था तभी मेरे मोबाईल की घंटी बजी और उधर से बोलने वाले व्यक्ति ने जिस तरह का घटना क्रम सरगुजा पुलिस रेंज के बलरामपुर पुलिस जिला के चांदों क्षेत्र में घटित घटना के बारे में बताया, उसे जानकर मैं अवाक रह गया और बार-बार अंदर से मैं पुलिस के विरोधी में काफी कुछ अंदर ही अंदर सोचता रहा। लेकिन तब और आश्चर्य हुआ जब शाम को यह खबर मिली की पुलिस ने इस घटना को मुठभेड़ बना दिया है साथ ही इस घटना पर एक तथाकथित स्वयं सेवी संगठन के कार्यकर्ता के विज्ञप्ति से हुई, जिन्होंने इस मुठभेड़ पर पुलिस का बचाव करते हुए बस इतना लिखा था कि पुलिस के मुठभेड़ में आम आदमी को शिकार बनना सोचने लायक है। इसके साथ ही मैं भी उन प्रमुख समाचार पत्रों का इंतजार सुबह तक करता रहा जो कि यहां पर प्रमुख समाचार पत्र हैं।
आज 7 जुलाई को सुबह तकरिबन 7 बजे ही मैं बस स्टैण्ड में पहुंच चुका था ताकि प्रमुख समाचार पत्रों में इस घटना पर प्रतिक्रिया के बारे में पढ़ सकुं। कुछ पेपरों व पत्रिकाओं ने तो पुलिस की सफलता के बखान किये तो वहीं कुछ ने इसका बचाव करते हुए इस घटना के पिछे पुलिस के द्वारा बताये गये कहानी के आगे कथित शब्द जोड़ कर यह भी जता दिया की सम्पूर्ण घटना में काफी खोट है।
पुलिस ने 15 घण्टे में अपने स्क्रीप्ट राईटर से एक कहानी लिखवाई जिसमें पुलिस ने अपने आप को हिरों व नक्सलियों को खलनायक की भूमिका देते हुए यह बताया कि बलरामपुर पुलिस जिला के चांदो क्षेत्र में पुलिस गश्त पर थी और अचानक पुलिस की मुठभेड़ नक्सलियों से हो गई, जिसमें पुलिस ने काफी साहस का परिचय देते हुए एक महिला नक्सली को मारने मंे सफलता अर्जित की, जिसके लिये पुलिस को आईजी ने पुरस्कार देने की भी घोषणा कर दी। वैसे तथाकथित पुलिस के सक्रिप्ट राईटर ने कहानी तो अच्छा लिखा जिसे सुनकर बाहरी दूनिया (घटना स्थल से बाहर के लोग) इस बात से इंकार नहीं कर सकते की यह पुलिस द्वारा बनाई गई कहानी है। लेकिन जो वास्तव में इस कहानी को जानता है, उस आक्रोश को दबाने के लिये पुलिस ने समस्त क्षेत्र में बंदूकधारी लोगों को तैनात कर दिया ताकि लोग कुछ कहने व करने से पहले व विरोध करने से पहले अपने अंजाम को बखुबी जान ले।

- पुलिस ने कहा मुठभेड़ हुई है और नक्सलियों की ओर से महिला को गोली लगी और वह मृत पायी गई।
- गांव के लोगों का कहना है केवल तीन राउण्ड फायर की आवाज आयी जो कि संबंधित युवती को ही लगी है।
- तीन फायर में ही मुठभेड़ समाप्त हो गया और नक्सली भाग गये यह कैसे संभव है।
- ग्रामीणों का कहना है कि यह घटना रात की है, जिसे पुलिस तड़के सबेरे की बता रही है।
- ग्रामीणों के अनुसार पुलिस ने ना तो कोई मुठभेड़ की और ना ही कोई नक्सली साहित्य व भरमार बंदूक बरामद हुआ है।
- ग्रामीणों के अनुसार घटना कुछ इस प्रकार है कि युवती रात में अपने किसी परिचित के घर के लिये निकली थी, जिसके बाद सुबह संबंधित घटना की जानकारी हुई।
- पुलिस ने ग्राम के लोगों के आक्रोश को दबाने के लिये भारी मात्रा में सुरक्षा बल क्षेत्र में तैनात कर दिये, ताकि लोग अपना आक्रोश प्रकट न कर सकें।

घटना के कई पहलु तो और हैं, जिसे यहां पर लिखना सही नहीं होगा, लेकिन इसका जवाब और इस पहलु को अब सरगुजा के कुछ समाज सेवी अदालत में लेकर जाएंगे, फिलहाल इस तथाकथित घटना में मारी गयी युवती के परिवार को सांत्वना देना तो दूर पुलिस ने इस घटना को नक्सली वारदात बता एक ऐसा कार्य किया है जो कि ऐसा लगता है, जैसे आमजन अब न तो घर के हैं और ना घाट के अर्थात इधर पुलिस की गोली कभी उन्हें अपना शिकार बना देती है तो कभी पुलिसिया मुखबिर की सूचना पर नक्सलियों की गोली।

सरगुजा जिले की लिये यह कोई पहली घटना नहीं है, बल्कि इससे पहले वाड्रफनगर के समिप एक जंगल में सुअर का शिकार करने गये ग्रामीणों को पुलिस ने नक्सली बता कर मारा था, जिसमें मुझे इस घटना में लोगों की ठिक संख्या तो याद नहीं है, लेकिन संभवतः तीन लोगों को घुटने में गोली लगी थी, इसके बाद कल पुलिस ने एक निर्दोश युवती को अपनी गोली का शिकार बनाया और मौत के घाट उतार दिया, इसके अलावा पुलिस के कई अफसर पूर्व में ऐसे रहे हैं जिनके की कई पुलिस व नक्सली मुठभेड़ सवाल के घेरे में हैं, जिनमें कई बार ग्रामीणों ने ऐसा विरोध दर्शाया है कि पुलिस ने जिन्हें नक्सली बता कर मारा है वे ग्राम के निर्दोश युवा व किशोर थे, जिसके लिये पुलिस के तथाकथित लोगों को पुरस्कारों द्वारा भी सम्मानित किया गया है।
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लेकिन अब ना तो ऐसे मामले महिला आयोग तक जायंगें और ना ही मानवाधिकार आयोग तक, क्यों कि ये सभी आयोग केवल निर्देश देने के लिये हैं, क्योंकि ऐसे कई मामले हैं जिनमें संबंधित आयोगों ने जांच के व कार्यवाही के आदेश दिये हैं, लेकिन अब तक कोई कार्यवाही नहीं हुई, इसका मतलब साफ है ये सभी आयोग केवल जनता को रिझाने के लिये हैं, लेकिन वास्तव में ये पंगु है।
इसलिये अब ऐसे मामलों को लेकर सरगुजा जिले के कुछ युवकों ने सर्वोच्च न्यायालय तक जाने का फैसला किया है, ताकि एक ऐसा तबका जो कि नक्सलियों से दूर अच्छे रास्ते पर चलकर खेती-बारी कर जीवनयापन कर रहे हैं, उन्हें पुलिसिया बंदूक के शिकार से बचाया जा सके ताकि निर्दोश लोगों के जान से खिलवाड़ करने वाले लोगों को समुचित सजा दिलायी जा सके।
चांदो मामले में चिख-चिख कर आमजन यह कह रहे हैं कि हमारी इस बेटी का क्या कसुर था कि उसे पुलिस की गोली ने अपना शिकार बनाया, घर के लोगों के आंसु रूकने का नाम नहीं ले रहा है और सभी सहसा यह विश्वास भी नहीं कर पा रहे हैं कि आखिर उनकी पुत्री को नक्सली कैसे बना दिया गया।
जो लोग पुलिस की द्वारा घटित किये गये इस घटना को नजदिक से जानते हैं, उनका तो साफ कहना है कि इस घटना में पुलिस ने युवती को पहले मारा और फिर जब अपने आप को फंसता पाया तो थाने में जवानों को भेजकर वर्दी व हथियार मंगवाये व अपने आप को बचाने के लिये युवती को नक्सली घोेषित कर दिया।
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चूंकि छ.ग. में विपक्ष की भूमिका अर्थात कांग्रेस की स्थिति भी काफी कमजोर है, जिसके कारण ऐसे निर्दोश लोगों को पताड़ित किये जाने वाले लोगों के हौसले काफी बढ़े हुए हैं, जिसके कारण वर्ष में कई ऐसे मामले सामने आ जाते हैं, जिसमें पुलिस नक्सली समझ कर कई लोगों का या तो सफाया कर देती है या फिर उन्हें गोली की शिकार बना घायल कर देती है।
चंूकि कांग्रेस अपने आप में हमेशा दलिय लड़ाई में ही उलझी रह जाती है, जिससे की इस तरह के मामले को लेकर कोई अवाज ही नहीं उठाता और कुछ स्वयं सेवी संस्था अवाज़ उठाते भी है तो वो भी मात्र दलाली करके अपना भला करते हैं और ऐसे मामलों में कुछ दिन हो हल्ला कर इससे दूरी बना लेते हैं। जिसके कारण इस तरह की घटना पर लगाम नहीं लग पा रहा है। जिसे देखते हुए गांव के समस्त ग्रामीणों के साथ जल्द ही एक स्वयं सेवी संस्था इस मामले में दोषियों पर कार्यवाही व निर्दोष को न्याय दिलाने हेतु माननीय सर्वोच्च न्यायालय जाने का फैसला किया है।

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